Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.151.2-3h: ये सब पाप मुझमें विद्यमान हैं; इसलिए मैं चिंता से इस प्रकार जल रहा हूँ मानो किसी ने मुझे अग्नि में डाल दिया हो। अपने दुष्कर्मों का स्मरण करके मेरा मन स्वतः प्रसन्न नहीं होता॥ 2 1/2॥ | mahabharat अध्याय 12.151: ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सर्वं हीदं दुष्कृतं मे ज्वलाम्यग्नाविवाहित:॥ २॥
स्वकर्माण्यभिसंधाय नाभिनन्दति मे मन:।
अनुवाद
ये सब पाप मुझमें विद्यमान हैं; इसलिए मैं चिंता से इस प्रकार जल रहा हूँ मानो किसी ने मुझे अग्नि में डाल दिया हो। अपने दुष्कर्मों का स्मरण करके मेरा मन स्वतः प्रसन्न नहीं होता॥ 2 1/2॥
‘All these sins are present in me; therefore I am burning with worry as if someone has placed me inside a fire. My mind is not automatically happy by remembering my misdeeds.॥ 2 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥