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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 15: अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.15.3 
दण्ड: संरक्षते धर्मं तथैवार्थं जनाधिप।
कामं संरक्षते दण्डस्त्रिवर्गो दण्ड उच्यते॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे जनेश्वर! दण्ड धर्म और अर्थ की रक्षा करता है, वह काम का भी रक्षक है, इसलिए दण्ड को त्रिवर्गरूप कहा गया है।
 
O Janeshwar! Punishment protects Dharma and Artha, it is the protector of Kama also, hence punishment is called Trivargrupa. 3.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)