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श्लोक 12.149.5-7  |
पिपासार्तोऽपि तद् दृष्ट्वा तृप्त:स्यान्नात्र संशय:।
उपवासकृशोऽत्यर्थं स तु पार्थिव लुब्धक:॥ ५॥
अनवेक्ष्यैव संहृष्ट: श्वापदाध्युषितं वनम्।
महान्तं निश्चयं कृत्वा लुब्धक: प्रविवेश ह॥ ६॥
प्रविशन्नेव स वनं निगृहीत: सकण्टकै:।
स कण्टकैर्विभिन्नाङ्गो लोहितार्द्रीकृतच्छवि:॥ ७॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज! चाहे किसी को कितनी भी प्यास क्यों न लगी हो, उस सरोवर के दर्शन मात्र से उसकी प्यास अवश्य तृप्त हो जाती है। इधर शिकारी उपवास के कारण अत्यन्त दुर्बल हो गया था, फिर भी उधर देखे बिना ही वह बड़े आनन्द से जंगली पशुओं से भरे उस वन में प्रवेश कर गया। अपने महान् लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दृढ़ संकल्पित होकर शिकारी उस वन में प्रविष्ट हुआ। प्रविष्ट होते ही वह कंटीली झाड़ियों में फँस गया। उसका सारा शरीर काँटों से छिद गया और लहूलुहान हो गया। |
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| King! No matter how much thirsty a person may be, he can certainly be satiated by merely seeing that lake. Here the hunter had become very weak due to fasting, yet without looking there he entered the forest full of wild animals with great joy. Determined to reach his great goal, the hunter entered that forest. As soon as he entered, he got trapped in the thorny bushes. His whole body was pierced by the thorns and became bloody. 5-7. |
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