श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 149: बहेलियेको स्वर्गलोककी प्राप्ति  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  12.149.2-3 
ईदृशेनैव तपसा गच्छेयं परमां गतिम्।
इति बुद्धॺा विनिश्चित्य गमनायोपचक्रमे॥ २॥
महाप्रस्थानमाश्रित्य लुब्धक: पक्षिजीवक:।
निश्चेष्टो मरुदाहारो निर्मम: स्वर्गकांक्षया॥ ३॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार तप करके मैं भी परम मोक्ष प्राप्त करूँगा, ऐसा बुद्धि से निश्चय करके पक्षियों का भक्षण करने वाला वह शिकारी उस स्थान को छोड़कर महाप्रस्थान मार्ग में चला गया। उसने सब प्रकार के कर्म त्याग दिए। वह श्वास लेकर जीवनयापन करने लगा। स्वर्ग की इच्छा से उसने अन्य सब वस्तुओं से अपनी आसक्ति हटा ली।॥2-3॥
 
Having decided with his intellect that he too will attain the ultimate salvation by performing penance in this manner, the hunter who made his living by birds left that place and took refuge in the path of Mahaprasthan. He gave up all kinds of activities. He started living by breathing air. With the desire of heaven, he removed his attachment towards all other things.॥ 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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