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mahabharat 12.148.2: प्रियतम! मुझे याद नहीं पड़ता कि तुमने मुझे कभी नाराज़ किया हो। सभी स्त्रियाँ, चाहे उनके कई पुत्र क्यों न हों, अपने पति को खो देने पर दुःख में डूब जाती हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.148: कबूतरीका विलाप और अग्निमें प्रवेश तथा उन दोनोंको स्वर्गलोककी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 148: कबूतरीका विलाप और अग्निमें प्रवेश तथा उन दोनोंको स्वर्गलोककी प्राप्ति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.148.2 
नाहं ते विप्रियं कान्त कदाचिदपि संस्मरे।
सर्वापि विधवा नारी बहुपुत्रापि शोचते॥ २॥
 
 
अनुवाद
प्रियतम! मुझे याद नहीं पड़ता कि तुमने मुझे कभी नाराज़ किया हो। सभी स्त्रियाँ, चाहे उनके कई पुत्र क्यों न हों, अपने पति को खो देने पर दुःख में डूब जाती हैं।
 
'Dearest! I do not remember you ever displeasing me. All women, even if they have many sons, are drowned in sorrow when they lose their husbands.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)