श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 145: कबूतरीका कबूतरसे शरणागत व्याधकी सेवाके लिये प्रार्थना  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  12.145.9-10h 
अस्माकं विहिता वृत्ति: कापोती जातिधर्मत:॥ ९॥
सा न्याय्याऽऽत्मवता नित्यं त्वद्विधेनानुवर्तितुम्।
 
 
अनुवाद
भगवान ने हमारी जाति के धर्म के अनुसार ही हमारा गोप-गोप का व्यवसाय बनाया है। आप जैसे बुद्धिमान पुरुष को उचित है कि सदैव उसी व्यवसाय का पालन करें॥9 1/2॥
 
‘God has made our profession of being a cowherd according to the religion of our caste. It is appropriate for a wise man like you to always follow that profession.॥ 9 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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