श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 145: कबूतरीका कबूतरसे शरणागत व्याधकी सेवाके लिये प्रार्थना  »  श्लोक 5-6h
 
 
श्लोक  12.145.5-6h 
इति संचिन्त्य दु:खार्ता भर्तारं दु:खितं तदा॥ ५॥
कपोती लुब्धकेनापि गृहीता वाक्यमब्रवीत्।
 
 
अनुवाद
ऐसा विचारकर वह कबूतरी दुःख से पीड़ित होकर तथा शिकारी के बंदीगृह में फँसी हुई अपने व्यथित पति से इस प्रकार कहने लगी -॥5 1/2॥
 
Thinking thus, the female pigeon, suffering with grief and trapped in the hunter's captivity, said this to her distressed husband -॥ 5 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas