श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 145: कबूतरीका कबूतरसे शरणागत व्याधकी सेवाके लिये प्रार्थना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.145.2 
कपोत्युवाच
अहोऽतीव सुभाग्याहं यस्या मे दयित: पति:।
असतो वा सतो वापि गुणानेवं प्रभाषते॥ २॥
 
 
अनुवाद
कबूतरी बोली, 'ओह! मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि मेरे प्रिय पति मेरे गुणों का गुणगान कर रहे हैं, चाहे वे गुण मुझमें हों या न हों।
 
The dove said, 'Oh! I am very fortunate that my dear husband is singing the praises of my virtues, whether I possess them or not.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)