श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 145: कबूतरीका कबूतरसे शरणागत व्याधकी सेवाके लिये प्रार्थना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.145.14 
इति सा शकुनी वाक्यं पञ्जरस्था तपस्विनी।
अतिदु:खान्विता प्रोक्त्वा भर्तारं समुदैक्षत॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार पिंजरे में पड़ी हुई तपस्वी कबूतरी अपने पति से यह वचन कहकर अत्यन्त दुःखी हो गई और उसके मुख की ओर देखने लगी ॥14॥
 
Thus lying in the cage, the ascetic pigeon, having said these words to her husband, became very sad and began to look at his face. ॥14॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतं प्रति कपोतीवाक्ये पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कबूतरके प्रति कबूतरीका वाक्यविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)