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श्लोक 12.145.1  |
भीष्म उवाच
एवं विलपतस्तस्य श्रुत्वा तु करुणं वच:।
गृहीता शकुनिघ्नेन कपोती वाक्यमब्रवीत्॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर! रोते हुए कबूतर के करुण वचन सुनकर शिकारी की कैद में फँसी हुई कबूतरी बोली। |
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| Bhishma says - Yudhishthir! Hearing the pitiful words of the weeping pigeon, the female pigeon trapped in the hunter's captivity said. |
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