श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 145: कबूतरीका कबूतरसे शरणागत व्याधकी सेवाके लिये प्रार्थना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.145.1 
भीष्म उवाच
एवं विलपतस्तस्य श्रुत्वा तु करुणं वच:।
गृहीता शकुनिघ्नेन कपोती वाक्यमब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर! रोते हुए कबूतर के करुण वचन सुनकर शिकारी की कैद में फँसी हुई कबूतरी बोली।
 
Bhishma says - Yudhishthir! Hearing the pitiful words of the weeping pigeon, the female pigeon trapped in the hunter's captivity said.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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