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mahabharat 12.142.8: एक ही धर्म या कर्म को कभी धर्म और कभी अधर्म माना जाता है। इसकी इस द्वैत अवस्था को द्वैत कहते हैं। जो इस द्वैत को नहीं जानता, वह द्वैत मार्ग पर पहुँचकर संशय में पड़ जाता है। हे भरतनंदन! बुद्धि के द्वैत को पहले ही भली-भाँति समझ लेना चाहिए। 8.   |   mahabharat अध्याय 12.142: आपात‍्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 142: आपात‍्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.142.8 
अद्वैधज्ञ: पथि द्वैधे संशयं प्राप्तुमर्हति।
बुद्धिद्वैधं वेदितव्यं पुरस्तादेव भारत॥ ८॥
 
 
अनुवाद
एक ही धर्म या कर्म को कभी धर्म और कभी अधर्म माना जाता है। इसकी इस द्वैत अवस्था को द्वैत कहते हैं। जो इस द्वैत को नहीं जानता, वह द्वैत मार्ग पर पहुँचकर संशय में पड़ जाता है। हे भरतनंदन! बुद्धि के द्वैत को पहले ही भली-भाँति समझ लेना चाहिए। 8.
 
The same Dharma or action is considered Dharma at one time and Adharma at another time. This dual state of it is called Dwaideh. One who does not know this duality, gets into doubt after reaching the dual path. O Bharatanandan! The duality of the intellect should be understood well beforehand. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)