श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 142: आपात‍्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.142.23 
ज्ञानमप्यपदिश्यं हि यथा नास्ति तथैव तत्।
तं तथा छिन्नमूलेन सन्नोदयितुमर्हसि॥ २३॥
 
 
अनुवाद
जो ज्ञान संदिग्ध है, उसका होना और न होना एक ही है; इसलिए तू उस संदेह को जड़ से उखाड़कर दूर कर दे (निःसंदेह ज्ञान का आश्रय ले)॥23॥
 
The knowledge which is doubtful, its existence and non-existence are the same; therefore you should uproot that doubt and remove it away (take shelter of doubtless knowledge)॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)