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mahabharat 12.141.90: विश्वामित्र बोले, "ऐसा कोई शास्त्र नहीं कहता कि अभक्ष्य खाना ब्राह्मण-हत्या के समान महापाप है। हाँ, शास्त्रों में यह स्पष्ट लिखा है कि मदिरापान करने से ब्राह्मण पापी हो जाता है; अतः मदिरापान अवश्य त्यागना चाहिए। जिस प्रकार अन्य कर्म निषिद्ध हैं, उसी प्रकार अभक्ष्य खाना भी निषिद्ध है। संकटकाल में एक बार किया गया सामान्य पाप जीवन भर किए गए पुण्यों को नष्ट नहीं करता।"   |   mahabharat अध्याय 12.141: ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 141: ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद  »  श्लोक 90
 
 
श्लोक  12.141.90 
विश्वामित्र उवाच
नैवातिपापं भक्ष्यमाणस्य दृष्टं
सुरां तु पीत्वा पततीति शब्द:।
अन्योन्यकार्याणि यथा तथैव
न पापमात्रेण कृतं हिनस्ति॥ ९०॥
 
 
अनुवाद
विश्वामित्र बोले, "ऐसा कोई शास्त्र नहीं कहता कि अभक्ष्य खाना ब्राह्मण-हत्या के समान महापाप है। हाँ, शास्त्रों में यह स्पष्ट लिखा है कि मदिरापान करने से ब्राह्मण पापी हो जाता है; अतः मदिरापान अवश्य त्यागना चाहिए। जिस प्रकार अन्य कर्म निषिद्ध हैं, उसी प्रकार अभक्ष्य खाना भी निषिद्ध है। संकटकाल में एक बार किया गया सामान्य पाप जीवन भर किए गए पुण्यों को नष्ट नहीं करता।"
 
Vishwamitra said, "There is no scriptural saying that eating inedible things is as great a sin as killing a brahmin. Yes, it is clearly found in the scriptures that a brahmin becomes sinful by drinking alcohol; therefore, drinking alcohol is definitely to be avoided. Just as other acts are prohibited, so is eating inedible things. A common sin committed once in a time of crisis does not destroy the good deeds done throughout one's life."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)