श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 141: ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  12.141.71 
विश्वामित्र उवाच
अगस्त्येनासुरो जग्धो वातापि: क्षुधितेन वै।
अहमापद्‍गत: क्षुत्तो भक्षयिष्ये श्वजाघनीम्॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
विश्वामित्र बोले, "भूखे अगस्त्य ऋषि ने वातापी नामक राक्षस को खा लिया था। मैं भूख के कारण अत्यन्त व्याकुल हूँ; अतः मैं अवश्य ही इस कुत्ते की जाँघ खाऊँगा।" 71.
 
Vishwamitra said, "The hungry sage Agastya had eaten the demon named Vatapi. I am in great trouble due to hunger; therefore I will certainly eat this dog's thigh." 71.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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