श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 141: ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद  »  श्लोक 53-54h
 
 
श्लोक  12.141.53-54h 
सोऽधर्मं बुद्धॺमानोऽपि हरिष्यामि श्वजाघनीम्।
अटन् भैक्ष्यं न विन्दामि यदा युष्माकमालये॥ ५३॥
तदा बुद्धि: कृता पापे हरिष्यामि श्वजाघनीम्।
 
 
अनुवाद
मैं जानता हूँ कि यह पाप है, फिर भी मैं इस कुत्ते की जाँघ ले लूँगा। जब आपके घर-घर घूमकर भीख माँगने पर भी मुझे भिक्षा नहीं मिली, तब मैंने यह पापकर्म करने का विचार किया है; इसलिए मैं कुत्ते की जाँघ ले लूँगा॥ 53 1/2॥
 
‘I know that this is a sin, yet I will take this dog's thigh. When I could not get alms even after roaming around your houses and begging, then I have thought of committing this sinful act; therefore I will take the dog's thigh.॥ 53 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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