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श्लोक 12.141.17  |
सरांसि सरितश्चैव कूपा: प्रस्रवणानि च।
हतत्विषो न लक्ष्यन्ते निसर्गाद् दैवकारितात्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| दैवी या प्राकृतिक सूखे के कारण बड़े-बड़े तालाब, नदियाँ, कुएँ और झरने भी सौंदर्यहीन हो गए ॥17॥ |
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| Even large lakes, rivers, wells and springs became devoid of any beauty due to the divine or natural drought. ॥ 17॥ |
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