श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 141: ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.141.17 
सरांसि सरितश्चैव कूपा: प्रस्रवणानि च।
हतत्विषो न लक्ष्यन्ते निसर्गाद् दैवकारितात्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
दैवी या प्राकृतिक सूखे के कारण बड़े-बड़े तालाब, नदियाँ, कुएँ और झरने भी सौंदर्यहीन हो गए ॥17॥
 
Even large lakes, rivers, wells and springs became devoid of any beauty due to the divine or natural drought. ॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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