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श्लोक 12.141.102  |
तस्मात् कौन्तेय विदुषा धर्माधर्मविनिश्चये।
बुद्धिमास्थाय लोकेऽस्मिन् वर्तितव्यं कृतात्मना॥ १०२॥ |
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| अनुवाद |
| अतः कुन्तीनन्दन! अपने मन को वश में करने वाले विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह इस संसार में धर्म और अधर्म का निर्णय करने के लिए अपनी शुद्ध बुद्धि का आश्रय लेकर उचित आचरण करे ॥102॥ |
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| So Kuntinandan! A learned man, who has controlled his mind, should behave appropriately by taking the help of his own pure intellect to decide between righteousness and unrighteousness in this world. 102॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि विश्वामित्रश्वपचसंवादे एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें विश्वामित्र और चाण्डालका संवादविषयक एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४१॥
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