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mahabharat 12.140.71: हितैषी ब्राह्मण भारद्वाज कणिक के कहे हुए उचित वचनों को सुनकर सौवीर के राजा ने उनका यथायोग्य पालन किया, जिससे वे अपने बन्धु-बान्धवों सहित तेजस्वी राजलक्ष्मी का भोग करने लगे।   |   mahabharat अध्याय 12.140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  12.140.71 
यथावदुक्तं वचनं हितार्थिना
निशम्य विप्रेण सुवीरराष्ट्रप:।
तथाकरोद् वाक्यमदीनचेतन:
श्रियं च दीप्तां बुभुजे सबान्धव:॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
हितैषी ब्राह्मण भारद्वाज कणिक के कहे हुए उचित वचनों को सुनकर सौवीर के राजा ने उनका यथायोग्य पालन किया, जिससे वे अपने बन्धु-बान्धवों सहित तेजस्वी राजलक्ष्मी का भोग करने लगे।
 
Hearing the correct words spoken by the well-wisher Brahmin Bhardwaj Kanik, the king of Sauvira followed them properly, due to which he along with his relatives started enjoying the bright Rajalakshmi.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कणिकोपदेशे चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कणिकका उपदेशविषयक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)