| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 14: द्रौपदीका युधिष्ठिरको राजदण्डधारणपूर्वक पृथ्वीका शासन करनेके लिये प्रेरित करना » श्लोक 28-29 |
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| | | | श्लोक 12.14.28-29  | अमरप्रतिमा: सर्वे शत्रुसाहा: परंतपा:।
एकोऽपि हि सुखायैषां मम स्यादिति मे मति:॥ २८॥
किं पुन: पुरुषव्याघ्र पतयो मे नरर्षभा:।
समस्तानीन्द्रियाणीव शरीरस्य विचेष्टने॥ २९॥ | | | | | | अनुवाद | | हे नरसिंह! शत्रुओं को कष्ट देने वाले, शत्रु सैनिकों के आक्रमण को सहने में समर्थ, देवताओं के समान तेजस्वी आपके ये सभी भाई मुझे पूर्ण सुखी कर सकते हैं, ऐसा मेरा विश्वास है, फिर मेरे ये पाँच श्रेष्ठ पुरुष पति क्या नहीं कर सकते? शरीर को क्रियाशील बनाने में जो इन्द्रियों का कार्य है, वही मेरे जीवन को सुखी बनाने में इन सबका भी है॥28-29॥ | | | | O lion of men! All these brothers of yours, who torment the enemies, are capable of bearing the onslaught of the enemy soldiers, are as illustrious as the gods, I believe that even one brave among them can make me completely happy, then what cannot these five best of men husbands of mine do? The role of all the senses in making the body active is the same as that of all these in making my life happy.॥28-29॥ | | ✨ ai-generated | | |
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