श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 14: द्रौपदीका युधिष्ठिरको राजदण्डधारणपूर्वक पृथ्वीका शासन करनेके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.14.15 
मित्रता सर्वभूतेषु दानमध्ययनं तप:।
ब्राह्मणस्यैव धर्म: स्यान्न राज्ञो राजसत्तम॥ १५॥
 
 
अनुवाद
श्रेष्ठ! सब प्राणियों से मैत्री करना, दान लेना, दान देना, अध्ययन और तप करना - यह ब्राह्मण का धर्म है, राजा का नहीं ॥15॥
 
The best! Friendship towards all living beings, taking donations, giving, study and penance - this is the religion of a Brahmin, not of a king. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)