श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 136: राजा किसका धन ले और किसका न ले तथा किसके साथ कैसा बर्ताव करे—इसका विचार  »  श्लोक 8-10
 
 
श्लोक  12.136.8-10 
तथा तथा जयेल्लोकान् शक्त्या चैव यथा यथा।
उद्भिज्जा जन्तवो यद्वच्छुक्लजीवा यथा यथा॥ ८॥
अनिमित्तात् सम्भवन्ति तथा यज्ञ: प्रजायते॥ ९॥
यथैव दंशमशकं यथा चाण्डपिपीलिकम्।
सैव वृत्तिरयज्ञेषु यथा धर्मो विधीयते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
धर्म में पारंगत राजा को चाहिए कि वह अपनी शक्ति के अनुसार लोकों पर विजय प्राप्त करे, जैसे पौधे (वृक्ष) अपनी शक्ति के अनुसार आगे बढ़ते हैं और जैसे कीड़े-मकोड़े आदि छोटे-छोटे जीव अनायास ही जन्म ले लेते हैं, वैसे ही यज्ञ न करने वाले और कर्तव्य-विरुद्ध मनुष्य भी अनायास ही राज्य में जन्म ले लेते हैं। अतः राजा को चाहिए कि वह शुभ कर्मों का विरोध करने वालों के साथ वैसा ही व्यवहार करे जैसा वह मच्छर, मक्खी और चींटी आदि कीड़ों के साथ करता है, जिससे धर्म का प्रसार हो।॥ 8-10॥
 
A king who is well versed with Dharma should conquer the worlds according to his strength, just as the plants (trees) move forward according to their strength and just as the small creatures like the insects etc. are born without any reason, similarly, without any reason, people who do not perform sacrifices and are against their duties are also born in the kingdom. Therefore, the king should treat those who oppose good deeds in the same way as he treats insects like mosquitoes, gnats and ants, so that Dharma may be spread.॥ 8-10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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