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श्लोक  12.135.25 
इदं कायव्यचरितं यो नित्यमनुचिन्तयेत्।
नारण्येभ्यो हि भूतेभ्यो भयं प्राप्नोति किंचन॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य प्रतिदिन कायव्य के इस चरित्र का चिंतन करता है, उसे वनवासी पशुओं से किंचितमात्र भी भय नहीं रहता।
 
He who daily contemplates upon this character of Kayavya does not have even the slightest fear from the forest-dwelling animals. 25.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)