अध्याय 135: मर्यादाका पालन करने-करानेवाले कायव्यनामक दस्युकी सद्गतिका वर्णन
श्लोक 1: भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! जो डाकू मरणोपरांत मरणोपरांत अधम गति को प्राप्त नहीं होता। इस विषय में विद्वान पुरुष प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं॥1॥
श्लोक 2-3: कायव्य नाम से प्रसिद्ध निषाद पुत्र ने डाकू होते हुए भी सिद्धि प्राप्त कर ली थी। वह आक्रमण करने में कुशल, वीर, बुद्धिमान, विद्वान, क्रूरता रहित, आश्रमवासियों के धर्म का रक्षक, ब्राह्मणभक्त और गुरुभक्त था। वह क्षत्रिय पिता से तथा निषाद जाति की स्त्री के गर्भ से उत्पन्न हुआ था; अतः वह सदैव क्षत्रिय धर्म का पालन करता था। 2-3॥
श्लोक 4: कायव्य प्रतिदिन सुबह-शाम वन में जाकर हिरणों के झुंड को उत्तेजित करते थे। वे विभिन्न प्रकार के हिरणों के स्वभाव से परिचित थे और उन्हें नियंत्रित करने की कला जानते थे। वे निषादों में सबसे कुशल थे।
श्लोक 5: उन्हें वन के सभी प्रदेशों का ज्ञान था। वे सदैव पारियात्र पर्वत पर विचरण करते थे और सभी प्राणियों के स्वभाव को जानते थे। उनके बाण अचूक निशाने पर लगते थे। उनके सभी अस्त्र-शस्त्र शक्तिशाली थे।
श्लोक 6: वह अकेले ही सैकड़ों लोगों की सेना को परास्त कर देता था और उस महान वन में रहकर अपने अंधे और बहरे माता-पिता की सेवा करता था।
श्लोक 7: वह निषाद अपने माता-पिता को मधु, मांस, फल, मूल और नाना प्रकार के अन्नों से आदरपूर्वक भोजन कराता था तथा अन्य पूज्य व्यक्तियों की भी सेवा-पूजा करता था।
श्लोक 8: वे वन में रहने वाले वानप्रस्थ और संन्यासी ब्राह्मणों की पूजा करते थे और प्रतिदिन उनके घर जाकर उन्हें भोजन आदि वस्तुएँ पहुँचाते थे ॥8॥
श्लोक 9: जो लोग इस भय से डाकू के हाथों से भोजन स्वीकार नहीं करते थे कि कहीं डाकू उनके घर का भोजन न खा ले, वह सुबह-सुबह ही उनके घरों में भोजन तथा अन्य खाद्य पदार्थ जैसे फल और कंदमूल छोड़ देते थे।
श्लोक 10: एक दिन हजारों डाकुओं ने, जो नियम का उल्लंघन करते हुए और नाना प्रकार के क्रूर कर्म करते थे, उनसे अपना नेता बनने की प्रार्थना की॥ 10॥
श्लोक 11: लुटेरों ने कहा - आप देश, काल और मुहूर्त को भली-भांति जानते हैं, विद्वान, शूरवीर और दृढ़ निश्चयी हैं; अतः हम सबकी सहमति से आप हमारे नेता बन जाइये।
श्लोक 12: आप जो आज्ञा देंगे, हम वही करेंगे। आप हमारे माता-पिता के समान हमारी उचित रीति से रक्षा करें॥12॥
श्लोक 13: कायव्य बोले- प्रिय मित्रों! स्त्री, कायर, बालक या तपस्वी को कभी नहीं मारना चाहिए। जो तुम्हारे साथ युद्ध न कर रहा हो, उसे भी मत मारो। स्त्रियों को बलपूर्वक कभी मत पकड़ो॥13॥
श्लोक 14: तुममें से कोई भी किसी भी प्रकार से किसी प्राणी की स्त्रियों का वध न करे। ब्राह्मणों के हित का सदैव ध्यान रखो। आवश्यकता हो तो उनकी रक्षा के लिए युद्ध भी करो॥14॥
श्लोक 15: खेत से फसल न उखाड़ो, विवाह आदि समारोहों में विघ्न न डालो, जहाँ देवता, पितर या अतिथि पूजन हो रहा हो, वहाँ विघ्न न डालो ॥15॥
श्लोक 16: समस्त प्राणियों में ब्राह्मण ही डाकुओं के हाथ से छूटने का विशेष अधिकारी है। तुम्हें अपना सर्वस्व देकर भी उसकी सेवा और पूजा करनी चाहिए। 16॥
श्लोक 17: देखो, जिसके पतन की बात ब्राह्मण क्रोधपूर्वक सोचते हैं, उसका तीनों लोकों में कोई रक्षक नहीं है ॥17॥
श्लोक 18: जो ब्राह्मणों की निन्दा करता है और उनका विनाश चाहता है, उसका पतन निश्चित है, जैसे सूर्योदय के साथ अंधकार नष्ट हो जाता है।
श्लोक 19: तुम लोग यहाँ बैठकर लूट का इनाम पाने की इच्छा रखो। तुम गिरोह बनाकर उन व्यापारियों पर हमला करोगे जो हमें स्वेच्छा से पैसा नहीं देंगे।
श्लोक 20: दण्ड का विधान दुष्टों का दमन करने के लिए है, अपनी संपत्ति बढ़ाने के लिए नहीं। जो सज्जनों को सताते हैं, उनके लिए दण्ड है उनका वध करना।
श्लोक 21: जो लोग राष्ट्र को हानि पहुँचाकर अपनी उन्नति करने का प्रयत्न करते हैं, वे शवों के बीच पड़े कीड़ों की भाँति तुरन्त नष्ट हो जाते हैं ॥21॥
श्लोक 22: जो लोग दस्यु कुल में उत्पन्न होकर भी धर्मशास्त्र के सिद्धांतों का पालन करते हैं, वे डाकू होते हुए भी शीघ्र ही सफलता प्राप्त कर लेते हैं (यदि ये सब बातें तुम्हें स्वीकार्य हों, तो मैं तुम्हारा नेता बन सकता हूँ)।॥ 22॥
श्लोक 23: भीष्म कहते हैं - राजन ! यह सुनकर उन डाकुओं ने कायव्य की सारी आज्ञा स्वीकार कर ली और सदैव उसका पालन करने लगे। इससे उन सबकी उन्नति हुई और वे पापकर्मों से विमुख हो गए॥ 23॥
श्लोक 24: कायव्य ने उस पुण्य कर्म को करके महान् सिद्धि प्राप्त की; क्योंकि उसने साधुओं का उपकार करते हुए लुटेरों को पाप से बचाया।
श्लोक 25: जो मनुष्य प्रतिदिन कायव्य के इस चरित्र का चिंतन करता है, उसे वनवासी पशुओं से किंचितमात्र भी भय नहीं रहता।
श्लोक 26: भरत! वह भूत-प्रेतों से भी नहीं डरता। राजा! वह किसी दुष्टात्मा से भी नहीं डरता। वह जंगल का राजा बन जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥