श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 126: राजा सुमित्रका मृगकी खोज करते हुए तपस्वी मुनियोंके आश्रमपर पहुँचना और उनसे आशाके विषयमें प्रश्न करना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  12.126.18-19 
भवत् तपोविघातो वा यदि स्याद् विरमे तत:।
यदि वास्ति कथायोगो योऽयं प्रश्नो मयेरित:॥ १८॥
एतत् कारणसामर्थ्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत:।
भवन्तोऽपि तपोनित्या ब्रूयुरेतत् समन्विता:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
यदि मेरा यह प्रश्न आपकी तपस्या में विघ्न डाल रहा है, तो मैं इसे विराम देता हूँ और यदि आपके पास बातचीत करने का समय हो, तो आप मेरे द्वारा उठाए गए प्रश्न का समाधान कर सकते हैं। मैं इस आशा का यथार्थ कारण और सामर्थ्य सुनना चाहता हूँ। आप भी सदैव तपस्या में तत्पर रहते हैं; अतः आप सब मिलकर इस प्रश्न पर विचार करें।॥18-19॥
 
‘If this question of mine is disturbing your penance, then I am taking a break from it and if you have time to talk, then you can resolve the question I have raised. I want to hear the exact reason and capability of this hope. You too are always engaged in penance; hence, gather together and discuss this question.’॥18-19॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२६॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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