श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 126: राजा सुमित्रका मृगकी खोज करते हुए तपस्वी मुनियोंके आश्रमपर पहुँचना और उनसे आशाके विषयमें प्रश्न करना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  12.126.15-16 
भवन्त: सुमहाभागास्तस्मात् पृच्छामि संशयम्।
आशावान् पुरुषो य: स्यादन्तरिक्षमथापि वा॥ १५॥
किं नु ज्यायस्तरं लोके महत्त्वात् प्रतिभाति व:।
एतदिच्छामि तत्त्वेन श्रोतुं किमिह दुर्लभम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
आप बड़े भाग्यशाली तपस्वी हैं; इसलिए मैं आपसे अपने मन का एक संदेह पूछ रहा हूँ। यदि एक ओर आशावान पुरुष है और दूसरी ओर अनंत आकाश है, तो संसार में महत्त्व की दृष्टि से आपको कौन-सा अधिक प्रतीत होता है? मैं इस विषय को विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। भला, यहाँ आने पर कौन-सी वस्तु दुर्लभ रह जाएगी?॥ 15-16॥
 
‘You are a very fortunate ascetic; therefore I am asking you about a doubt of my mind. If on one side there is a hopeful man and on the other side there is the infinite sky, then which one seems greater to you in terms of importance in the world? I want to hear this matter in detail. Well, which thing will remain rare after coming here?॥ 15-16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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