श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 126: राजा सुमित्रका मृगकी खोज करते हुए तपस्वी मुनियोंके आश्रमपर पहुँचना और उनसे आशाके विषयमें प्रश्न करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.126.11 
किं नु दु:खमतोऽन्यद् वै यदहं श्रमकर्शित:।
भवतामाश्रमं प्राप्तो हताशो भ्रष्टलक्षण:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
मेरे कठिन परिश्रम के कारण मुझे जो दुःख हुआ है और जो मैं अपना राजचिन्ह खोकर निराश्रित की भाँति आपके आश्रम में आया हूँ, उससे अधिक दुःख और क्या हो सकता है?॥ 11॥
 
'What could be more painful than the pain that I have suffered due to my hard work and the fact that I have come to your hermitage like a destitute, having lost my royal insignia?॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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