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mahabharat 12.125.3: पितामह! मुझे दुर्योधन से बड़ी आशा थी कि युद्ध का अवसर आने पर वह उचित कार्य करेगा। प्रभु! मैंने सोचा था कि वह बिना युद्ध किए ही आधा राज्य मुझे लौटा देगा॥3॥   |   mahabharat अध्याय 12.125: युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न—उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 125: युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न—उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.125.3 
पितामहाशा महती ममासीद्धि सुयोधने।
प्राप्ते युद्धे तु तद् युक्तं तत् कर्तायमिति प्रभो॥ ३॥
 
 
अनुवाद
पितामह! मुझे दुर्योधन से बड़ी आशा थी कि युद्ध का अवसर आने पर वह उचित कार्य करेगा। प्रभु! मैंने सोचा था कि वह बिना युद्ध किए ही आधा राज्य मुझे लौटा देगा॥3॥
 
Grandfather! I had great hopes from Duryodhan that when the opportunity of war presents itself, he will do the right thing. Lord! I thought that he will return half the kingdom to me without fighting the war.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)