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mahabharat 12.125.2: हे शत्रु नगर को जीतने वाले पितामह! मेरे मन में एक महान् संशय उत्पन्न हो गया है। आपके अतिरिक्त और कोई भी इसका समाधान नहीं कर सकता॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 12.125: युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न—उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 125: युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न—उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.125.2 
संशयो मे महानेष समुत्पन्न: पितामह।
छेत्ता च तस्य नान्योऽस्ति त्वत्त: परपुरञ्जय॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रु नगर को जीतने वाले पितामह! मेरे मन में एक महान् संशय उत्पन्न हो गया है। आपके अतिरिक्त और कोई भी इसका समाधान नहीं कर सकता॥ 2॥
 
Grandfather, who conquered the enemy city! A great doubt has arisen in my mind. There is no one else except you who can resolve it.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)