श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.124.8 
धृतराष्ट्र उवाच
किमर्थं तप्यसे पुत्र श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत:।
श्रुत्वा त्वामनुनेष्यामि यदि सम्यग् भविष्यति॥ ८॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, "पुत्र! तुम इतने परेशान क्यों हो? मैं इसे स्पष्ट रूप से सुनना चाहता हूँ। यदि उचित हो तो मैं तुम्हें समझाने का प्रयास करूँगा।"
 
Dhritarashtra said, "Son! Why are you so upset? I want to hear it clearly. If it is appropriate, I will try to explain it to you."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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