श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  12.124.67 
यदन्येषां हितं न स्यादात्मन: कर्म पौरुषम्।
अपत्रपेत वा येन न तत् कुर्यात् कथंचन॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारा जो भी प्रयास या कार्य दूसरों के लिए हितकर न हो अथवा जिसे करने में तुम्हें लज्जा आती हो, उसे किसी भी स्थिति में नहीं करना चाहिए ॥67॥
 
Whatever effort or action of yours is not beneficial to others or which you feel shy in doing, you should not do it under any circumstances. ॥ 67॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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