श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  12.124.66 
अद्रोह: सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत् प्रशस्यते॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
मन, वाणी और कर्म से किसी भी प्राणी को कष्ट न देना, सब पर दया करना और अपनी शक्ति के अनुसार दान देना 'शील' कहलाता है, जिसकी सभी लोग प्रशंसा करते हैं॥ 66॥
 
Not harming any living being by thoughts, speech or actions, being kind to all and giving charity as per one's capability is called 'Shiel' (morality), which is praised by all.॥ 66॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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