श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  12.124.58-59 
ततो भयं प्रादुरासीत् प्रह्रादस्य महात्मन:॥ ५८॥
अपृच्छत् स ततो भूय: क्व यासि कमलालये।
त्वं हि सत्यव्रता देवी लोकस्य परमेश्वरी।
कश्चासौ ब्राह्मणश्रेष्ठस्तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
तब महात्मा प्रह्लाद अत्यन्त भयभीत हो गए। उन्होंने पुनः पूछा- 'कमला! तुम कहाँ जा रही हो? तुम तो सत्य की देवी और सम्पूर्ण जगत की अधिष्ठात्री देवी हो। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कौन था? मैं यह निश्चित रूप से जानना चाहता हूँ।'॥ 58-59॥
 
Then Mahatma Prahlada got very scared. He asked again- 'Kamlala! Where are you going, you are the goddess of truth and the goddess of the whole world. Who was that great Brahmin? I want to know this for sure.'॥ 58-59॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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