श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  12.124.55 
तस्मिन् गते महाशब्द: शरीरात् तस्य निर्ययौ।
पृष्टश्चाह बलं विद्धि यतो वृत्तमहं तत:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
उसके जाने के बाद प्रह्लाद के शरीर से फिर एक पुरुष प्रकट हुआ जो घोर शब्द करता हुआ आया। पूछने पर उसने कहा - 'मुझे बल समझो। जहाँ धर्म है, वहाँ मेरा भी स्थान है।'॥55॥
 
After he left, a man again appeared from Prahlad's body making a loud sound. When asked, he said - 'Consider me a strength. Wherever there is righteousness, there is my place too.'॥ 55॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas