श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 53-54
 
 
श्लोक  12.124.53-54 
तस्मिन्ननुगते सत्ये महान् वै पुरुषोऽपर:॥ ५३॥
निश्चक्राम ततस्तस्मात् पृष्टश्चाह महाबल:।
वृत्तं प्रह्राद मां विद्धि यत: सत्यं ततो ह्यहम्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
सत्य के चले जाने पर प्रह्लाद के शरीर से एक और महापुरुष प्रकट हुए। उनका परिचय पूछने पर उस महापुरुष ने उत्तर दिया - प्रह्लाद! मुझे पुण्यात्मा समझो। जहाँ सत्य है, वहाँ मैं भी निवास करता हूँ। 53-54
 
After Satya left, another great man appeared from Prahlad's body. When asked for his introduction, that mighty man replied - Prahlad! Consider me virtuous. Wherever there is truth, I also reside there. 53-54.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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