श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.124.47 
तमपृच्छन्महाकायं प्रह्राद: को भवानिति।
प्रत्याहतं तु शीलोऽस्मि त्यक्तो गच्छाम्यहं त्वया॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
प्रह्लाद ने उस विशालकाय व्यक्ति से पूछा, ‘तुम कौन हो?’ उसने उत्तर दिया, ‘मैं शील हूँ। तुमने मुझे त्याग दिया है, इसलिए मैं जा रहा हूँ।’
 
Prahlada asked the giant man, 'Who are you?' He replied, 'I am Sheel. You have abandoned me, so I am leaving.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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