श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.124.44 
एवमस्त्विति स प्राह प्रह्रादो विस्मितस्तदा।
उपाकृत्य तु विप्राय वरं दु:खान्वितोऽभवत्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
फिर भी 'ऐसा ही हो' कहकर प्रह्लाद ने वरदान दे दिया। उस समय उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। ब्राह्मण को वरदान देकर वह बहुत दुःखी हुआ। 44.
 
Still saying 'so be it' Prahlada granted the boon. At that time he was very surprised. He became very sad after granting the boon to the Brahmin. 44.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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