श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.124.41 
कृतमित्येव दैत्येन्द्रमुवाच स च वै द्विज:।
प्रह्रादस्त्वब्रवीत् प्रीतो गृह्यतां वर इत्युत॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
तब ब्राह्मण ने दैत्यराज से कहा, "आपने मेरी सब इच्छाएँ पूरी कर दी हैं।" यह सुनकर प्रह्लाद और भी प्रसन्न हुए और बोले, "वर माँगिए।" ॥41॥
 
Then the Brahmin said to the demon king, "You have fulfilled all my desires." Hearing this, Prahlada became even more pleased and said, "Ask for a boon." ॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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