श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.124.40 
यथावद् गुरुवृत्त्या ते प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम।
वरं वृणीष्व भद्रं ते प्रदातास्मि न संशय:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! तुमने अपने गुरु की जो उचित सेवा की है, उससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। कोई भी वर माँगो, मैं उसे अवश्य दूँगा। इसमें कोई संदेह नहीं है।॥40॥
 
'O best of Brahmins! I am very pleased with the proper service you have done to your Guru. May you be blessed. Ask for any boon. I will grant it. There is no doubt about this.'॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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