श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.124.18 
दुर्योधन उवाच
कथं तत् प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत।
येन शीलेन तै: प्राप्ता क्षिप्रमेव वसुन्धरा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
दुर्योधन ने पूछा, "भरत! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि वह पुण्य कैसे प्राप्त किया जा सकता है, जिसके द्वारा उन राजाओं ने शीघ्र ही संसार का राज्य प्राप्त कर लिया।" 18.
 
Duryodhana asked, "Bharata! I wish to hear how one can attain that virtue by which those kings soon gained the kingdom of the world." 18.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas