| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन » श्लोक 12-13 |
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| | | | श्लोक 12.124.12-13  | दृष्ट्वा च तां सभां दिव्यां दिव्यपुष्पफलान्विताम्।
अश्वांस्तित्तिरकल्माषान् वस्त्राणि विविधानि च॥ १२॥
दृष्ट्वा तां पाण्डवेयानामृद्धिं वैश्रवणीं शुभाम्।
अमित्राणां सुमहतीमनुशोचामि भारत॥ १३॥ | | | | | | अनुवाद | | भारत! दिव्य फल-फूलों से सुशोभित उस दिव्य सभा को, तीतरों के रंग के उन चित्तीदार घोड़ों को, नाना प्रकार के दिव्य वस्त्रों को (वे सब मेरे पास कहाँ हैं?) देखकर तथा अपने शत्रु पाण्डवों के कुबेर के समान शुभ और विशाल ऐश्वर्य को देखकर मैं निरन्तर शोक में डूब रहा हूँ॥12-13॥ | | | | Bhaarat! Seeing that divine assembly decorated with divine fruits and flowers, those spotted horses of the colour of partridges, and those divine clothes of various kinds (where do I have all that?), and observing the auspicious and vast opulence of my enemy the Pandavas, which was like that of Kubera, I am constantly drowning in sorrow. ॥12-13॥ | | ✨ ai-generated | | |
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