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mahabharat 12.122.42: सूर्यपुत्र मनु ने प्रजा की रक्षा के लिए अपने पुत्रों को दण्ड सौंपा था। वही दण्ड धीरे-धीरे अधिकारियों के हाथ में आकर प्रजा की रक्षा करता हुआ जागृत रहता है ॥ 42॥   |   mahabharat अध्याय 12.122: दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 122: दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  12.122.42 
तं ददौ सूर्यपुत्रस्तु मनुर्वै रक्षणार्थकम्।
आनुपूर्व्याच्च दण्डोऽयं प्रजा जागर्ति पालयन्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
सूर्यपुत्र मनु ने प्रजा की रक्षा के लिए अपने पुत्रों को दण्ड सौंपा था। वही दण्ड धीरे-धीरे अधिकारियों के हाथ में आकर प्रजा की रक्षा करता हुआ जागृत रहता है ॥ 42॥
 
Manu, the son of Sun, had entrusted the staff to his sons for the protection of the subjects. The same staff, gradually coming into the hands of officers, remains awake protecting the subjects. ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)