श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 120: राजधर्मका साररूपमें वर्णन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.120.9 
नित्यमुद्यतदण्ड: स्यादाचरेदप्रमादत:।
लोके चायव्ययौ दृष्ट्वा बृहद्‍वृक्षमिवास्रवत्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
वह अपराधियों को दण्ड देने में सदैव तत्पर रहे, प्रत्येक कार्य सावधानी से करे, प्रजा की आय-व्यय पर दृष्टि रखे और ताड़ के वृक्ष से रस निकालने के समान उससे धन का रस निकाले (अर्थात् जिस प्रकार रस के लिए वृक्ष को नहीं काटा जाता, उसी प्रकार प्रजा का भी नाश न करे)॥9॥
 
He should always be ready to punish the criminals, should perform every task with caution, should look at people's income and expenditure and extract the juice of wealth from them like extracting juice from a palm tree (i.e. just as a tree is not cut down for the juice, similarly the people should not be destroyed).॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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