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श्लोक 12.120.56  |
एतान् मयोक्ताश्चर राजधर्मान्
नॄणां च गुप्तौ मतिमादधत्स्व।
अवाप्स्यसे पुण्यफलं सुखेन
सर्वो हि लोको नृप धर्ममूल:॥ ५६॥ |
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| अनुवाद |
| हे मनुष्यों के स्वामी! मेरे द्वारा बताए गए इन राजधर्मों का पालन करो और प्रजापालन में मन लगाओ। ऐसा करने से तुम्हें सुखपूर्वक पुण्य का फल प्राप्त होगा; क्योंकि समस्त जगत का मूल धर्म ही है। 56। |
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| O lord of men! Follow these royal duties as told by me and concentrate on taking care of the people. By doing this you will happily attain the fruits of virtue; because the root of the whole world is Dharma. 56. |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राजधर्मकथने विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राजधर्मका वर्णनविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२०॥
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