श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 120: राजधर्मका साररूपमें वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  12.120.55 
प्रीतिप्रवृत्तौ विनिवर्तितौ यथा
सुहृत्सु विज्ञाय निवृत्य चोभयो:।
यदेव मित्रं गुरुभारमावहेत्
तदेव सुस्निग्धमुदाहरेद् बुध:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
यदि दो मित्र प्रेमपूर्वक किसी कार्य में मिलकर लगें और उसे मिलकर ही पूरा करें, तो उन्हें भली-भाँति जानकर जो मित्र अपने मित्र का अधिक भार उठाने में समर्थ हो, उसे विद्वान पुरुष को परम स्नेही मित्र समझना चाहिए और दूसरों को उसका उदाहरण देना चाहिए ॥ 55॥
 
If two friends lovingly engage in a task together and finish it together, then after knowing them well, the friend who is able to return and shoulder the greater burden of his friend should be considered by the learned person as the most affectionate friend and should give his example to others. ॥ 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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