| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 120: राजधर्मका साररूपमें वर्णन » श्लोक 5 |
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| | | | श्लोक 12.120.5  | तैक्ष्ण्यं जिह्मत्वमादाल्भ्यं सत्यमार्जवमेव च।
मध्यस्थ: सत्त्वमातिष्ठंस्तथा वै सुखमृच्छति॥ ५॥ | | | | | | अनुवाद | | राजा को मध्यस्थ रहना चाहिए और तीक्ष्णता, कुटिल नीति, निर्भयता, सत्य, सरलता और उत्तम भावना का अवलम्बन करना चाहिए। ऐसा करने से ही उसे सुख की प्राप्ति होती है ॥5॥ | | | | The king should remain a mediator and rely on sharpness, crooked policy, fearlessness, truth, simplicity and noble spirit. Only by doing this does he attain happiness. 5॥ | | ✨ ai-generated | | |
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