श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 118: राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.118.20 
नाहंवादी न निर्द्वन्द्वो न यत्किंचनकारक:।
कृते कर्मण्यमात्यानां कर्ता भृत्यजनप्रिय:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
उसे अहंकार त्याग देना चाहिए, द्वन्द्वों से प्रभावित नहीं होना चाहिए, जो मन में आए वैसा नहीं करना चाहिए, अपने मंत्रियों के कार्यों का अनुमोदन करना चाहिए और अपने सेवकों से प्रेम करना चाहिए ॥20॥
 
He should give up ego, should not be affected by conflicts, should not do whatever comes to his mind, should approve of the actions done by his ministers and should love his servants. ॥20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)