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mahabharat 12.116.23: महाराज! अब उसे कभी फल-मूल खाने की इच्छा ही नहीं हुई। जैसे वन का राजा सिंह प्रतिदिन पशुओं का मांस खाना चाहता है, उसी प्रकार वह बाघ भी उस समय मांसाहारी हो गया।   |   mahabharat अध्याय 12.116: सज्जनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक महर्षि और कुत्तेकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 116: सज्जनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक महर्षि और कुत्तेकी कथा  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.116.23 
न मूलफलभोगेषु स्पृहामप्यकरोत् तदा।
यथा मृगपतिर्नित्यं प्रकाङ्क्षति वनौकस:।
तथैव स महाराज व्याघ्र: समभवत् तदा॥ २३॥
 
 
अनुवाद
महाराज! अब उसे कभी फल-मूल खाने की इच्छा ही नहीं हुई। जैसे वन का राजा सिंह प्रतिदिन पशुओं का मांस खाना चाहता है, उसी प्रकार वह बाघ भी उस समय मांसाहारी हो गया।
 
Maharaj! Now he never had any desire to eat fruits and roots. Just like the king of the forest lion wants to eat the flesh of animals every day, in the same way that tiger also became a carnivore at that time.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्वर्षिसंवादे षोडशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कुत्ता और ऋषिका संवादविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११६॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)