श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 114: दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह लेनेसे लाभ  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.114.17 
मनुष्यशालावृकमप्रशान्तं
जनापवादे सततं निविष्टम्।
मातङ्गमुन्मत्तमिवोन्नदन्तं
त्यजेत तं श्वानमिवातिरौद्रम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति सदैव दूसरों की निन्दा करने में तत्पर रहता है, वह मनुष्य रूपी घर में रहने वाले भेड़िये के समान है। वह सदैव बेचैन रहता है। वह पागल हाथी की तरह चिल्लाता है और अत्यंत खतरनाक कुत्ते की तरह काटने के लिए दौड़ता है। सज्जन पुरुष को उसे सदैव त्याग देना चाहिए। 17.
 
He who is always ready to criticize others is like a wolf living in the house of a human being's body. He always remains restless. He screams like a mad elephant and runs to bite like a very dangerous dog. A noble man should abandon him forever. 17.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)