श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  12.111.d1 
(पर्णाहार: कदाचिच्च नियमव्रतवानपि।
कदाचिदुदकेनापि वर्तयन्ननुयन्त्रित:॥ )
 
 
अनुवाद
व्रत-नियमों का पालन करने में तत्पर रहते हुए, कभी पत्ता चबाते तो कभी केवल जल पीते। उनका जीवन संयम में बंधा हुआ था।
 
Being ready to follow the fasts and rules, sometimes he would chew a leaf and sometimes he would just drink water. His life was bound in self-restraint.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)