श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  12.111.89 
एवंविधं सान्त्वमुक्त्वा धर्मकामार्थहेतुमत्।
प्रसादयित्वा राजानं गोमायुर्वनमभ्यगात्॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
धर्म, अर्थ, काम और तर्क से परिपूर्ण ऐसे सुखदायी वचन बोलकर सियार ने बाघराज को प्रसन्न कर लिया और उनकी अनुमति लेकर वन में चला गया।
 
By speaking such comforting words full of Dharma, Artha, Kama and logic, the jackal pleased the Tiger King and taking his permission went into the forest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)